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कठोपनिषद 1.2.23

रोज़ का श्लोक

आत्माकृपाभक्ति

अर्थ — यह आत्मा न उपदेश से, न बुद्धि से और न बहुत श्रवण से प्राप्त होता है। जिसे यह स्वयं चुन लेता है, उसी को मिलता है; उसी के लिए यह आत्मा अपना स्वरूप प्रकट करता है।

यह मंत्र बताता है कि आत्म-ज्ञान केवल पढ़ने-सुनने से नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा और शुद्ध भक्ति से मिलता है। ज्ञान से अधिक विनय और समर्पण आवश्यक है।

श्लोक

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥

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स्रोत: कठोपनिषद