बृहदारण्यक उपनिषद 2.4.5
रोज़ का श्लोक
अर्थ — हे प्रिये ! आत्मा को देखना चाहिए, सुनना चाहिए, मनन करना चाहिए और निदिध्यासन करना चाहिए।
यज्ञवल्क्य की यह शिक्षा आत्म-ज्ञान के चार सोपान — दर्शन, श्रवण, मनन और निदिध्यासन — बताती है। यह वेदांत-साधना का आधार-सूत्र है।
श्लोक
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।
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स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद