मुंडकोपनिषद 3.1.1
रोज़ का श्लोक
अर्थ — दो पक्षी (जीव और ईश्वर) जो साथी और मित्र हैं, एक ही वृक्ष पर बैठे हैं। उनमें से एक (जीव) स्वादिष्ट फल खाता है, दूसरा (ईश्वर) बिना खाए देखता रहता है।
मुंडकोपनिषद का यह प्रसिद्ध दृष्टांत जीवात्मा और परमात्मा के संबंध को दर्शाता है। जीव कर्मफल भोगता है, परमात्मा साक्षी बनकर देखता रहता है।
श्लोक
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥
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स्रोत: मुंडकोपनिषद