देव-प्रतिमा
शब्दावली
अन्य नाम: देव मूर्ति, प्रतिमा, देव विग्रह
देव-प्रतिमा वह शिल्प-रचना है जिसमें किसी देवता के स्वरूप को शास्त्र-निर्धारित तालमान, मुद्रा, आयुध और आभूषणों के साथ ढालकर प्रतिष्ठित किया जाता है। इसे पूजा, ध्यान और दर्शन का मूर्त आधार माना गया है। शिल्प-ग्रंथों में प्रतिमा को केवल कला-वस्तु नहीं, बल्कि उपासना का साधन कहा गया है।
प्रतिमा-विधान मुख्यतः विष्णुधर्मोत्तर पुराण, अग्नि पुराण, मानसार, शिल्परत्न तथा विविध आगम-ग्रंथों में मिलता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा, गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती आदि प्रत्येक देवता की प्रतिमा के लिए पृथक लक्षण बताए गए हैं, जिससे देवता की पहचान उसके रूप, आयुध और वाहन से होती है।
चित्रसूत्र में कहा गया है कि मूर्तिकला में भी चित्रकला के नियम लागू होते हैं, चाहे मूर्ति पत्थर, धातु या लकड़ी की हो। प्रतिमा सामान्यतः चार प्रकार की होती है — वाहन पर बैठी (यानक), खड़ी (स्थानक), बैठी (आसन) और शयन करती (शयन)। मंदिरों में स्थायी तथा उत्सव में वहन की जाने वाली भोग-प्रतिमा, दोनों की परंपरा रही है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: विष्णुधर्मोत्तर पुराण (चित्रसूत्र), शिल्प शास्त्र