पूर्त
शब्दावली
अन्य नाम: पूर्त-कर्म, इष्टापूर्त
पूर्त का अर्थ है — लोक-कल्याण के वे कर्म जो सबके हित के लिए किए जाते हैं, जैसे कूप, वापी (बावड़ी) तथा तड़ाग (तालाब) खुदवाना, देवालय एवं मंदिर बनवाना तथा अभ्यर्थियों को अन्नदान करना। यह इष्ट का सहचर शब्द है।
शास्त्रीय आधार — मार्कण्डेय पुराण, अत्रिसंहिता तथा अग्नि पुराण में पूर्त का लक्षण मिलता है; पद्म पुराण तथा स्कन्द पुराण में इसका विस्तार है।
विधि एवं महत्व — स्मृतियों के अनुसार इष्ट से स्वर्ग तथा पूर्त से मोक्ष की प्राप्ति होती है। शूद्र भी पूर्त-धर्म का पालन कर सकता था, यद्यपि वैदिक यज्ञ-कर्म का अधिकार उसे नहीं था। इस प्रकार पूर्त सबके लिए सुलभ धर्म-साधन बना।
प्रसिद्ध कथन
वापीकूपतडागानि देवतायतनानि च । अन्नप्रदानमर्थिभ्यः पूर्तमित्यभिधीयते ॥ (मार्कण्डेय पुराण)
संबंधित
स्रोत: मार्कण्डेय पुराण, अत्रिसंहिता, पद्म पुराण