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मूर्ति-लक्षण

शब्दावली

अन्य नाम: मूर्ति लक्षण, प्रतिमा लक्षण, तालमान

मूर्ति-शास्त्रशिल्प

मूर्ति-लक्षण प्रतिमा-निर्माण के उन शास्त्रीय नियमों को कहते हैं जिनसे देवता के अंग-प्रत्यंग, माप, मुद्रा, आसन, आयुध और आभूषण निर्धारित होते हैं। शिल्प-ग्रंथों में इन नियमों का पालन अनिवार्य बताया गया है, क्योंकि नियम-भंग से उत्पन्न दोष को 'वेध-दोष' कहा जाता है।

मूर्ति-लक्षण की परंपरा मुख्यतः विष्णुधर्मोत्तर पुराण, मानसार, शिल्परत्न तथा काश्यप-शिल्प आदि ग्रंथों में मिलती है। इसमें आधार-माप अंगुल होता है और बारह अंगुल का एक 'ताल' माना जाता है; देवता के अनुसार दस ताल से एक ताल तक की ऊँचाई निर्धारित होती है।

माप में उत्तम, मध्यम और अधम भेद होते हैं तथा प्रतिमा की मुद्राएँ भी शास्त्र से तय होती हैं। शिल्पकार को चाहिए कि वह प्रतिमा का मान उस देवता, स्थान और प्रासाद के अनुसार निश्चित करे; इन्हीं नियमों से प्रतिमा सप्रमाण और दर्शनीय बनती है।

प्रसिद्ध कथन

एक विद्वान कलाकार को अपनी बुद्धि की सहायता से क्षय और वृद्धि के साथ आनुपातिक माप का प्रयोग करना चाहिए। (विष्णुधर्मोत्तर पुराण — भावानुवाद)

संबंधित

देव-प्रतिमाआभूषणआयुधवाहनमोहिनी मूर्ति

स्रोत: विष्णुधर्मोत्तर पुराण, मानसार, शिल्प शास्त्र