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षोडशी (त्रिपुरसुंदरी)

देवी एवं उपासना

अन्य नाम: त्रिपुरसुंदरी, ललिता, राजराजेश्वरी, श्रीविद्या, कामेश्वरी

महाविद्याश्रीविद्यासौम्य रूपश्रीकुल

षोडशी, जिन्हें त्रिपुरसुंदरी, ललिता और राजराजेश्वरी भी कहा जाता है, दस महाविद्याओं में तृतीय हैं। 'षोडशी' का अर्थ है सोलह वर्ष की नित्य-किशोरी; वे सदा सोलह कलाओं से पूर्ण मानी जाती हैं। इनका वर्ण उगते सूर्य के समान अरुण है, तीन शांत नेत्र हैं और हाथों में अंकुश, पाश, धनुष और पुष्प-बाण धारण हैं। वे मणिद्वीप में श्रीचक्र के मध्य विराजमान रहती हैं।

षोडशी की उपासना श्रीविद्या परंपरा का केंद्र है। इनका वर्णन ललिता सहस्रनाम, त्रिपुरा रहस्य, वामकेश्वर तंत्र और नित्याषोडशिकार्णव जैसे ग्रंथों में विस्तार से मिलता है। श्रीकुल के साधक इन्हें सर्वोच्च देवी मानते हैं।

इनका बीज समूह 'ऐं ह्रीं श्रीं' और मूल मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरसुन्दर्यै नमः' है। उपासना श्रीचक्र (श्रीयंत्र) तथा पंचदशी-षोडशी विद्या के जप से की जाती है। इससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति तथा सौभाग्य और ऐश्वर्य की वृद्धि मानी जाती है।

प्रसिद्ध कथन

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरसुन्दर्यै नमः॥
ऐं ह्रीं श्रीं — श्रीविद्या का बीज-समूह।

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स्रोत: श्रीविद्या परंपरा; ललिता सहस्रनाम