तारा
देवी एवं उपासना
अन्य नाम: तारिणी, नील सरस्वती, एकजटा, उग्रतारा
तारा दस महाविद्याओं में द्वितीय हैं। 'तारा' शब्द का अर्थ है 'तारने वाली', अर्थात जो भक्त को भव-सागर के संकटों से पार उतारती हैं। इनका वर्ण नील (गहरा नीला) है, तीन नेत्र हैं और केश जटा-रूप में बँधे हैं। वे हाथों में कैंची, कपाल और कमल धारण करती हैं तथा शव-रूप शिव पर खड़ी दिखाई देती हैं। तंत्र में इन्हें 'नील सरस्वती' कहा जाता है, क्योंकि वे वाणी और ज्ञान की अधिष्ठात्री भी हैं।
तारा की उपासना बंगाल और तिब्बत की तांत्रिक परंपराओं में विशेष प्रचलित रही है। मान्यता है कि सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ने इनकी आराधना की थी। इनका वर्णन विभिन्न शाक्त तंत्र-ग्रंथों और महाविद्या-संबंधी रचनाओं में मिलता है।
तारा का बीज मंत्र 'स्त्रीं' और मूल मंत्र 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्' है। इनकी साधना संकट, भय और रोग के नाश तथा वाक्-सिद्धि और मोक्ष के लिए की जाती है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित तारापीठ इनका प्रमुख शक्तिपीठ है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: तंत्र-परंपरा; महाविद्या-ग्रंथ