लक्ष्मी
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: श्री, पद्मा, कमला, वरलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, हरिप्रिया
लक्ष्मी धन, समृद्धि, सौभाग्य और ऐश्वर्य की देवी हैं। वे विष्णु की शाश्वत पत्नी हैं और इसीलिए जहाँ विष्णु अवतरित होते हैं, वहाँ सीता, रुक्मिणी आदि रूपों में उनका सहचर्य रहता है। समुद्र मंथन के समय वे क्षीरसागर से प्रकट हुईं और स्वयं विष्णु ने उन्हें वरण किया — इसी कारण उन्हें 'क्षीरसागर-कन्या' और 'पद्मा' कहा जाता है।
उनका स्वरूप स्वर्ण-गौर, कमल पर विराजमान, चतुर्भुजा — जिनमें कमल-पुष्प और धन की वर्षा करते हाथ हैं। वाहन उलूक (उल्लू) है। उनके आठ स्वरूप 'अष्टलक्ष्मी' कहे जाते हैं — आदिलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, धैर्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी और धनलक्ष्मी।
दीपावली पर लक्ष्मी-पूजन का प्रमुख उत्सव है; माना जाता है कि इस रात्रि में वे घरों में भ्रमण करती हैं। कार्तिक पूर्णिमा को 'लक्ष्मी-समुद्र-मंथन से प्रकट होने' का स्मरण होता है। शुक्रवार और वरलक्ष्मी व्रत उनकी उपासना के विशेष दिन हैं।
श्रीसूक्त (ऋग्वेद का परिशिष्ट-भाग) लक्ष्मी की प्रसिद्ध वैदिक स्तुति है। उनकी महिमा विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण और लक्ष्मी तंत्र में विस्तृत है।
नाते-रिश्ते
- पति: विष्णु
- वाहन: उलूक
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: विष्णु पुराण; श्रीमद्भागवत पुराण; श्रीसूक्त