प्रलय
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: महाप्रलय, संहार, कल्पांत, प्रलय-काल
प्रलय सृष्टि के संहार का काल है, जिसमें समस्त लोक और जगत् विलीन हो जाते हैं। शास्त्रों में प्रलय के अनेक प्रकार बताए गए हैं — नित्य, नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यंतिक। नित्य प्रलय प्रतिदिन होता माना जाता है, नैमित्तिक प्रलय ब्रह्मा के दिन के अंत में और प्राकृतिक प्रलय ब्रह्मा के जीवन के अंत में माना जाता है।
विष्णु पुराण में वर्णन है कि कल्प के अंत में भगवान विष्णु संहारक रूप धारण करते हैं और समस्त जगत् जल में विलीन हो जाता है। प्रलय के समय सूर्य की अनेक अग्नियाँ प्रकट होकर समस्त लोकों को भस्म कर देती हैं। इसके पश्चात् शेष-शय्या पर विराजित विष्णु निद्रा में लीन होते हैं।
प्रलय का संबंध सृष्टि, कल्प, ब्रह्मांड और संहार के देवताओं से गहरा माना जाता है। यह सृष्टि-चक्र का वह बिंदु है जहाँ से नई रचना का आरंभ होता है। इस प्रकार प्रलय विनाश न होकर नए सृजन की पृष्ठभूमि माना जाता है।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: विष्णु पुराण