सृष्टि
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: सृष्टि-रचना, जगत-रचना, संसार
सृष्टि का अर्थ है जगत की रचना या उत्पत्ति। शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं, जो प्रत्येक कल्प में जगत को पुनः रचते हैं। सृष्टि का क्रम स्थिर नहीं, बल्कि चक्राकार माना गया है — रचना, पालन और संहार। इसीलिए सृष्टि को अनादि और अनंत माना जाता है।
भागवत पुराण के अनुसार सृष्टि की दस अवस्थाएँ बताई गई हैं, जिन्हें 'दश-लक्षण' कहा जाता है। इनमें सृष्टि, विसर्ग, स्थिति, पोषण, ऊति, मन्वंतर, ईश-कथा, निरोध, मुक्ति आदि आते हैं। विष्णु पुराण में भी सृष्टि के क्रम का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें सर्वप्रथम जल, फिर बुद्धि, अहंकार और तत्वों की उत्पत्ति बताई गई है।
सृष्टि का संबंध ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कल्प और प्रलय से गहरा माना जाता है। यह त्रिदेवों की तीन शक्तियों — रचना, पालन और संहार — के माध्यम से चलती मानी जाती है। इस प्रकार सृष्टि समस्त जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय का नाम है।
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स्रोत: भागवत पुराण