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मातंगी

देवी एवं उपासना

अन्य नाम: उच्छिष्ट चांडालिनी, तांत्रिक सरस्वती, मातंगेश्वरी, राजमातंगी

महाविद्यासौम्य रूपवाक्-सिद्धि

मातंगी दस महाविद्याओं में नौवीं हैं। इन्हें तांत्रिक सरस्वती और उच्छिष्ट चांडालिनी कहा जाता है। इनका वर्ण पन्ने के समान हरा या श्याम है, तीन शांत नेत्र हैं और हाथों में खड्ग, कपाल और वीणा धारण हैं। वे राजसी सिंहासन पर विराजमान रहती हैं।

मातंगी का वर्णन श्रीविद्या तथा शाक्त तंत्र-ग्रंथों में मिलता है। इन्हें ललिता (त्रिपुरसुंदरी) की मंत्रिणी कहा जाता है। ये वाणी और कला की अधिष्ठात्री हैं।

इनका मूल मंत्र 'ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा' है और बीज 'ऐं' (वाणी) है। उपासना से वाक्-सिद्धि, संगीत-कला में निपुणता, शीघ्र विवाह और गृहस्थ-सुख की प्राप्ति होती है। मातंगी ही एक ऐसी महाविद्या हैं जो उच्छिष्ट (भोजन-शेष) का ग्रहण करती हैं — यह बताता है कि दिव्य ज्ञान हर स्थान में, यहाँ तक कि समाज के हाशिये में भी विद्यमान है।

प्रसिद्ध कथन

ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा॥
ऐं — मातंगी का वाणी-बीज मंत्र।

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स्रोत: श्रीविद्या परंपरा; मंत्र महोदधि