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काली

देवी एवं उपासना

अन्य नाम: महाकाली, आद्या काली, श्यामा, दक्षिणा काली

महाविद्याशक्तितंत्रउग्र रूप

काली दस महाविद्याओं में प्रथम और आदि शक्ति का सबसे उग्र रूप मानी जाती हैं। इनका नाम 'काल' शब्द से बना है, अर्थात वे स्वयं समय और उसके क्षय की देवी हैं। इनका वर्ण श्याम (काला) है, केश बिखरे हुए हैं, तीन नेत्र हैं और गले में मुंडमाला विराजती है। वे शव पर खड़ी दिखाई देती हैं, जो शिव का प्रतीक है। उनका स्वरूप भले ही भयंकर लगे, पर वे मातृ-रूपा करुणामयी हैं, जो भक्त के अज्ञान, भय और अहंकार को नष्ट करके उसे मुक्ति देती हैं।

काली का वर्णन सर्वप्रथम देवी महात्म्य (मार्कंडेय पुराण) में मिलता है, जहाँ वे दुर्गा के भ्रू-मध्य से प्रकट होकर रक्तबीज का संहार करती हैं। शाक्त तंत्र-ग्रंथों—जैसे मुंडमाला तंत्र, तोडल तंत्र, शाक्तप्रमोद और महाकाल संहिता—में इनकी साधना का विस्तृत विधान है। देवी भागवत पुराण में भी इनकी महिमा का गान है।

काली की उपासना प्रायः रात्रि में, श्मशान या एकांत स्थान में, गुरु के मार्गदर्शन में की जाती है। 'क्रीं' इनका बीज मंत्र है और 'ॐ क्रीं कालिकायै नमः' मूल मंत्र। उपासना से भय, शत्रु-बाधा और अहंकार का नाश होता है तथा साधक को वाक्-सिद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। काली कुल की ये अधिष्ठात्री हैं और तंत्र-साधना की प्राण-शक्ति मानी जाती हैं।

प्रसिद्ध कथन

ॐ क्रीं कालिकायै नमः॥
क्रीं — काली का एकाक्षरी बीज मंत्र।

संबंधित

दुर्गाशिवशक्तिचामुंडादेवी भागवत पुराणशक्तिपीठ

स्रोत: देवी महात्म्य (मार्कंडेय पुराण); तंत्र-परंपरा