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छिन्नमस्ता

देवी एवं उपासना

अन्य नाम: छिन्नमस्तिका, प्रचंड चंडिका, वज्रवैरोचनी

महाविद्याउग्र रूपआत्म-बलि

छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में पाँचवीं हैं। 'छिन्न' अर्थात कटा और 'मस्त' अर्थात सिर — वे अपने ही हाथ से अपना सिर काटकर उसे थामे हुए दर्शायी जाती हैं। इनका वर्ण अरुण-लाल है, केश बिखरे हैं और गले में मुंडमाला है। उनके कटे कंधे से रक्त की तीन धाराएँ बहती हैं, जिन्हें वे स्वयं तथा उनकी दो सहचरियाँ डाकिनी और वर्णिनी पीती हैं। वे कामदेव और रति के ऊपर खड़ी हैं, जो वासना पर विजय का प्रतीक है।

इनका वर्णन छिन्नमस्ता तंत्र, शाक्तप्रमोद तथा मंत्र महोदधि जैसे तांत्रिक ग्रंथों में मिलता है। इनका संबंध भगवान परशुराम की परंपरा से भी जोड़ा जाता है।

इनका मूल मंत्र 'श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा' है। उपासना से चिंता, भय और अहंकार का नाश होता है तथा वैराग्य और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। यह साधना अत्यंत गोपनीय मानी जाती है और गुरु के मार्गदर्शन में ही की जाती है।

प्रसिद्ध कथन

श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा॥
ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं हूं फट् — छिन्नमस्ता का षडक्षरी मंत्र।

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स्रोत: छिन्नमस्ता तंत्र; मंत्र महोदधि