भैरवी
देवी एवं उपासना
अन्य नाम: त्रिपुर भैरवी, श्मशान भैरवी, कामेश्वरी भैरवी
भैरवी, जिन्हें त्रिपुर भैरवी भी कहा जाता है, दस महाविद्याओं में छठी हैं। ये भगवान भैरव की शक्ति और स्त्री-रूप हैं। इनका वर्ण हजार उगते सूर्यों के समान अरुण है, तीन उग्र नेत्र हैं और केश जटा में बँधे हैं। हाथों में माला, पुस्तक तथा अभय और वरद मुद्रा धारण करती हैं। ये तप (तपस्या) और अग्नि तत्व की देवी हैं।
भैरवी का वर्णन शाक्त तंत्र-ग्रंथों, महाभागवत पुराण और त्रिपुरा-संबंधी रचनाओं में मिलता है। इन्हें भैरव की परंपरा से जोड़ा जाता है।
इनका बीज 'ह्सौः' और मूल मंत्र 'ॐ ह्रीं भैरवी क्लीं हुं फट् स्वाहा' है। उपासना से साधक सभी बंधनों से मुक्त होता है तथा व्यापार और धन-संपदा की वृद्धि होती है।
प्रसिद्ध कथन
ॐ ह्रीं भैरवी क्लीं हुं फट् स्वाहा॥
ह्सौः — भैरवी का बीज मंत्र।
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स्रोत: तंत्र-परंपरा; शाक्तप्रमोद