धूमावती
देवी एवं उपासना
अन्य नाम: ज्येष्ठा, धूम्रवती
धूमावती दस महाविद्याओं में सातवीं हैं। 'धूम' अर्थात धुआँ — इनका वर्ण धुएँ जैसा धूसर है। वे विधवा के वेश में, श्वेत वस्त्र पहने, झुर्रीदार शरीर और बिखरे धूसर केशों वाली दर्शायी जाती हैं। इनकी आँखें लाल हैं और मुख सूखा है। वे बिना घोड़ों के रथ पर बैठी हैं, जिस पर कौवे का ध्वजा फहराता है, और हाथ में सूप (छाज) धारण करती हैं।
धूमावती का वर्णन शाक्त तंत्र-ग्रंथों और मंत्र महोदधि में मिलता है। इन्हें 'ज्येष्ठा' या अलक्ष्मी-स्वरूप भी कहा जाता है। ये अकेली ऐसी महाविद्या हैं जिनका कोई भैरव नहीं है।
इनका बीज 'धूं' और मूल मंत्र 'ॐ धूं धूं धूमावत्यै स्वाहा' है। उपासना से ऋण, दरिद्रता, शत्रु-बाधा और कलह दूर होते हैं तथा साधक को महाप्रतापी और सिद्ध बनने की शक्ति मिलती है। यद्यपि ये अशुभ और निषेध की देवी मानी जाती हैं, फिर भी वे भक्त को भय से मुक्त करके मोक्ष की ओर ले जाती हैं।
प्रसिद्ध कथन
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स्रोत: तंत्र-परंपरा; मंत्र महोदधि