अग्निचयन
शब्दावली
अन्य नाम: अग्निचयन यज्ञ, अग्निचिति
अग्निचयन का अर्थ है — इष्टकाओं (ईंटों) द्वारा यज्ञीय अग्नि के लिए वेदी का संचय अर्थात् निर्माण। यह श्रौत परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कर्मकांड है।
शास्त्रीय आधार — शुक्ल यजुर्वेद के अध्याय 11 से 18 तथा शतपथ ब्राह्मण के छठे से दसवें कांड (अग्निरहस्य सहित) में इसका विस्तृत विवेचन है।
विधि एवं महत्व — इसमें गार्हपत्य अग्नि से अग्नि लेकर विशेष आकार की उत्तर-वेदी बनाई जाती है, जिसमें सहस्रों इष्टकाएँ क्रमबद्ध रूप से रखी जाती हैं। यह सोमयाग तथा अन्य श्रौत यज्ञों की पूर्व-आवश्यकता मानी जाती है। अग्नि को सम्पूर्ण ब्रह्मांड तथा प्राण का प्रतीक माना गया है।
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स्रोत: शुक्ल यजुर्वेद, शतपथ ब्राह्मण