पंचमहायज्ञ
शब्दावली
अन्य नाम: पंच महायज्ञ, पाँच महायज्ञ
पंचमहायज्ञ वे पाँच नित्य यज्ञ हैं जिन्हें गृहस्थ को प्रतिदिन करने का विधान है। ये हैं — ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याय तथा अध्यापन), पितृयज्ञ (तर्पण), देवयज्ञ (होम), भूतयज्ञ (बलि) तथा नृयज्ञ (अतिथि-पूजन)।
शास्त्रीय आधार — मनुस्मृति के तृतीय अध्याय (श्लोक 69 से 71) तथा शतपथ ब्राह्मण में इनका विधान मिलता है। इन्हें अहुत, हुत, प्रहुत, ब्रह्महुत तथा प्राशित नामों से भी जाना जाता है।
विधि एवं महत्व — मनुस्मृति के अनुसार गृहस्थ के जीवन में पाँच 'हत्या-स्थान' (चूल्हा, चक्की, झाड़ू, ओखली-मूसल तथा जल-पात्र) माने गए हैं; इन पंचमहायज्ञों के पालन से वह इन दोषों से मुक्त हो जाता है। इनका लक्ष्य ऋषियों, पितरों, देवताओं, प्राणियों तथा मनुष्यों — सबके प्रति गृहस्थ का ऋण चुकाना है।
प्रसिद्ध कथन
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् । होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ (मनुस्मृति 3.70)
संबंधित
स्रोत: मनुस्मृति, शतपथ ब्राह्मण