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सोमयज्ञ

शब्दावली

अन्य नाम: सोमयाग, सोम यज्ञ

यज्ञश्रौतसोम

जिन यज्ञों में सोम नामक लता के रस की आहुति दी जाती है, उन्हें सोमयज्ञ कहते हैं। हविर्यज्ञों (जैसे अग्निहोत्र तथा दर्शपूर्णमास) के विपरीत इनमें सोमरस प्रधान द्रव्य होता है।

शास्त्रीय आधार — ऋग्वेद के नवें मंडल में अनेक सोम-सूक्त हैं; यजुर्वेद तथा शतपथ, ऐतरेय एवं तैत्तिरीय जैसे ब्राह्मण-ग्रंथों में इनकी विधि मिलती है। कात्यायन तथा आपस्तम्ब आदि के श्रौतसूत्र इनके प्रमुख स्रोत हैं।

विधि एवं महत्व — सोमयज्ञ तीन सवनों (प्रातः, मध्याह्न तथा सायं) में सम्पन्न होते हैं, जिनमें सोमरस का अभिषव, ग्रहण तथा आहुति होती है। वसंत ऋतु इनका प्रमुख काल माना गया। अग्निष्टोम इन सबका मूल आदर्श है।

प्रसिद्ध कथन

अपाम सोमममृता अभूम — हमने सोम का पान किया और अमर हो गए। (ऋग्वेद 8.48.3)

संबंधित

यज्ञअग्निष्टोमअश्वमेध यज्ञराजसूय यज्ञवाजपेयचार वेद

स्रोत: ऋग्वेद, यजुर्वेद, शतपथ ब्राह्मण