स्यमंतक मणि
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: स्यमंतक मणि प्रसंग, जांबवती विवाह
सत्राजित नाम के यादव को सूर्यदेव की कृपा से 'स्यमंतक' नाम की दिव्य मणि मिली, जिससे प्रतिदिन आठ भार स्वर्ण उत्पन्न होता था। कृष्ण ने मणि राजा को सौंप देने की सलाह दी, पर सत्राजित ने मणि देना स्वीकार नहीं किया।
कुछ समय बाद सत्राजित का भाई प्रसेन मणि पहनकर शिकार करने गया और वन में मारा गया। उसका और मणि का पता न चलने पर द्वारका में यह आरोप लगा कि मणि की लालसा में कृष्ण ने ही प्रसेन की हत्या की।
अपनी निर्दोषता सिद्ध करने के लिए कृष्ण कुछ यादवों के साथ वन में गए। वहाँ उन्होंने प्रसेन का घोड़ा और एक मरे सिंह को पाया, और सिंह की खोज में आगे बढ़ने पर एक गुफा में जांबवान (भालूराज) को पाया।
जांबवान ने सिंह को मारकर मणि अपने पास रख ली थी। कृष्ण और जांबवान में अठारह दिन तक भीषण युद्ध हुआ, अंत में जांबवान ने कृष्ण को स्वयं भगवान पहचानकर शरण ली और मणि तथा अपनी पुत्री जांबवती सहित उन्हें समर्पित हुआ। कृष्ण ने जांबवती से विवाह किया और मणि लौटाकर सत्राजित को दी, जिससे उनका अपयश दूर हुआ।
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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – दशम स्कन्ध