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रुक्मिणी हरण

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: रुक्मिणी विवाह, रुक्मिणी-कृष्ण परिणय

दशम स्कन्धरुक्मिणीविवाहद्वारका

विदर्भ नरेश की पुत्री रुक्मिणी श्रीकृष्ण को हृदय से पति रूप में चाहती थीं। पर उनके भाई रुक्मि ने उनका विवाह चेदिराज शिशुपाल से तय कर दिया।

विवाह से पूर्व रुक्मिणी ने एक विश्वासपात्र ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को अपना संदेश भेजा और उन्हें शीघ्र आने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने संदेश पाकर द्वारका से रथ लेकर विदर्भ की ओर प्रस्थान किया।

रुक्मिणी देवी-मंदिर में दर्शन के लिए गई थीं; वहाँ से निकलकर उन्होंने श्रीकृष्ण का रथ पकड़ लिया। कृष्ण ने उन्हें रथ पर बिठाकर ले जाना आरंभ किया, और बलराम सहित यदु-सेना साथ चली।

रुक्मि और अन्य राजाओं ने पीछा किया, पर वे पराजित हुए। बलराम ने रुक्मि को परास्त करके उसका अपमान किया। इस प्रकार श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह द्वारका में भव्य रूप से हुआ। रुक्मिणी कृष्ण की अष्टमहिषियों में प्रधान मानी जाती हैं।

प्रसिद्ध कथन

रुक्मिणी ने संदेश भेजा — 'हे मुरारी, मैं आपको ही मन से वर चुकी हूँ; शीघ्र आइए।' (भावानुवाद)

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – दशम स्कन्ध