श्रीकृष्ण
महाभारत
अन्य नाम: वासुदेव, माधव, गोविंद, मुरारी, द्वारकाधीश, यदुकुलश्रेष्ठ
श्रीकृष्ण यदुवंशी राजा वसुदेव और देवकी के पुत्र थे। उनका जन्म मथुरा के कारागार में हुआ, क्योंकि मामा कंस ने देवकी के गर्भ से अपनी मृत्यु का संकेत पाकर दंपति को बंदी बना रखा था। जन्म लेते ही उन्हें यमुना पार गोकुल पहुँचाया गया, जहाँ नंद और यशोदा ने उनका पालन किया। गोकुल और वृंदावन की बाल्य-लीलाएँ, कालिय-मर्दन, गोवर्धन धारण तथा पूतना, केशी आदि असुरों का वध उनसे जुड़े हैं।
मथुरा लौटकर उन्होंने कंस का वध किया और जरासंध के बार-बार के आक्रमणों के कारण यदुवंश को द्वारका ले जाकर बसाया। रुक्मिणी, सत्यभामा, जांबवती आदि से विवाह हुआ और प्रद्युम्न, सांब आदि पुत्र हुए। महाभारत में वे पांडवों के परम हितैषी और मार्गदर्शक रहे — द्रौपदी-स्वयंवर से लेकर राजसूय यज्ञ, वनवास, अज्ञातवास और कुरुक्षेत्र तक हर संकट में उन्होंने पांडवों का साथ दिया।
कुरुक्षेत्र में उन्होंने स्वयं शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा करके अर्जुन के सारथी का कार्य किया और युद्ध के आरम्भ में भगवद्गीता का उपदेश दिया। वे कूटनीति, धर्म-रक्षा और भक्त-वात्सल्य के केंद्रीय चरित्र हैं। अंत में गांधारी के शाप तथा यदुवंश के परस्पर संहार के बाद उन्होंने प्रभास-तीर्थ में देह त्यागी।
नाते-रिश्ते
- पिता: वसुदेव, माता: देवकी
- भाई: बलराम, बहन: सुभद्रा
- मामा: कंस
- पत्नी: रुक्मिणी
- सखा: अर्जुन
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
स्वयं विष्णु का अवतार; पूर्वजन्म में नारायण थे।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: महाभारत – आदि पर्व; भगवद्गीता