सूर्य
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: रवि, आदित्य, भास्कर, दिनकर, सविता, मित्र
सूर्य सूर्य-तत्त्व और ज्योति के देवता हैं, तथा नवग्रहों में प्रमुख ग्रह। वे दृश्य जगत् के साक्षी और समस्त जीवन के पोषक हैं — वेदों में उन्हें 'सविता' और 'आदित्य' कहकर स्तुत किया गया। सूर्यवंश (रघुकुल, इक्ष्वाकु, राम) उन्हीं से चला, इसीलिए उन्हें 'रघुकुल-प्रदीप' परंपरा का मूल कहा जाता है।
उनका रथ सात अश्वों (सप्त रश्मि) द्वारा खींचा जाता है और सारथी अरुण (अरुणादित्य) हैं। उनकी पत्नी संज्ञा (या सरयू) से यम, यमुना, श्रद्धा और वैवस्वत मनु आदि संतानें हुईं; छाया से शनि तथा सावर्णि मनु उत्पन्न हुए। सूर्य को 'मित्र' और 'विवस्वान' नामों से भी पुकारा जाता है।
प्रसिद्ध प्रसंगों में — सूर्य के तेज से विश्वकर्मा द्वारा उनका तेज घटाना, हनुमान का सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास, और सूर्यवंश की राजगाथा प्रमुख हैं। कर्ण भी सूर्य के पुत्र थे। कुष्ठरोगी रोगियों और ऋषियों के आरोग्य के लिए सूर्य-उपासना का विधान है।
सूर्य की उपासना कोणार्क (ओडिशा), अरसवल्ली, दक्षिण भारत के सूर्य-मंदिरों, छठ पर्व और सूर्य नमस्कार में जीवंत है। रामायण का 'आदित्यहृदय स्तोत्र' (अगस्त्य द्वारा राम को सिखाया गया) सूर्य-स्तुति का प्रसिद्धतम रूप है।
नाते-रिश्ते
- पत्नी: संज्ञा, छाया
- पुत्र: यम, शनि, वैवस्वत मनु
- सारथी: अरुण
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: ऋग्वेद; भविष्य पुराण (सूर्य); रामायण (आदित्यहृदय स्तोत्र)