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नारद

वेद एवं पुराण

अन्य नाम: देवर्षि, नारद मुनि, वीणापाणि, कलहप्रिय, ब्रह्मपुत्र

ऋषिदेवर्षिभक्तिवीणा

नारद देवर्षि हैं — ब्रह्मा के मानस पुत्रों में एक और त्रिलोक में स्वतंत्र रूप से भ्रमण करने वाले ऋषि। वे विष्णु के परम भक्त हैं और सदा 'नारायण-नारायण' का जप करते चलते हैं। तीनों लोकों के संदेशवाहक के रूप में वे देव-कार्य साधते हैं और भक्तों को भक्ति का मार्ग दिखाते हैं।

उनका स्वरूप हाथ में वीणा (महती वीणा) लिए, भ्रमणशील ऋषि का है। 'कलहप्रिय' कहलाने का कारण लोक-परंपरा में यह है कि उनके द्वारा बोए गए वाक्यों से अनेक बार बड़े प्रसंग जन्म लेते हैं — पर पीछे उद्देश्य देव-हित होता है। भक्ति-सूत्र (नारद भक्ति सूत्र) की परंपरा उन्हीं से जुड़ी है, तथा 'नारद पांचरात्र' वैष्णव आगम-ग्रंथ उनके नाम पर है।

प्रसिद्ध प्रसंगों में — प्रह्लाद को गर्भावस्था में भक्ति-दीक्षा देना, ध्रुव को नारायण-उपासना का मार्ग बताना, वाल्मीकि को राम-कथा का बीज देना, और शिव-पार्वती के विवाह में दूत बनना प्रमुख हैं। कथा-साहित्य में वे नारद-नारदी तथा मोहिनी-प्रसंगों से भी जुड़े हैं।

नारद की महिमा श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण और महाभारत में विस्तृत है।

नाते-रिश्ते

  • पिता: ब्रह्मा (मानस पुत्र)
  • भक्त: विष्णु

प्रसिद्ध कथन

नारद का निरंतर जप — "नारायण नारायण" — भक्ति और स्मरण का प्रतीक है। (लोक व पुराण-परंपरा में सर्वमान्य)
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार नारद ने प्रह्लाद को जन्म से पूर्व ही भगवद्भक्ति का उपदेश दिया। (भावानुवाद)
मंत्र — "ॐ नारदाय नमः।"

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ब्रह्माविष्णुप्रह्लादकश्यपइंद्र

स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण; विष्णु पुराण; महाभारत