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रास लीला

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: रासलीला, महारास

दशम स्कन्धरासगोपियाँवृंदावन

शरद ऋतु की पूर्णिमा की रात वृंदावन में चाँदनी बिखरी थी। श्रीकृष्ण ने अपनी बाँसुरी बजाई और उसकी मधुर ध्वनि से आकर्षित होकर गोपियाँ अपने घर-काज छोड़कर कृष्ण के पास आ पहुँचीं।

कृष्ण ने गोपियों के साथ यमुना तट पर रास-नृत्य आरंभ किया। श्रीमद्भागवत के अनुसार कृष्ण अपनी योगमाया से अनेक रूप धारण करके प्रत्येक गोपी के साथ नृत्य करने लगे, जिससे कोई भी गोपी अपने को उपेक्षित नहीं समझी।

रास के मध्य गोपियों में अहंकार का भाव उत्पन्न होते ही कृष्ण अंतर्धान हो गए। उनके वियोग से व्याकुल गोपियाँ 'हे कृष्ण! हे कृष्ण!' पुकारती हुईं वन-वन भटकीं और उनका पद (गोपी-गीत) गाया।

अंत में गोपियों की अनन्य भक्ति और विनय से प्रसन्न होकर कृष्ण पुनः प्रकट हुए और रास पूर्ण हुआ। रास-लीला को भक्त और भगवान के बीच आत्म-समर्पण तथा नि:स्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है, जिस पर अनेक भक्ति-परंपराओं में विस्तार से विचार किया गया है।

प्रसिद्ध कथन

गोपियाँ बोलीं — 'हे कृष्ण, आपके बिना हमारा कोई नहीं; हमारा जीवन आप ही हैं।' (भावानुवाद)

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स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण – दशम स्कन्ध