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राजसूय यज्ञ

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: राजसूय, सम्राट-यज्ञ

यज्ञइंद्रप्रस्थशिशुपालजरासंध

खांडव दहन के बाद मय दानव ने इंद्रप्रस्थ में दिव्य सभा बनाई और पांडवों का वैभव बढ़ा। तब श्रीकृष्ण के परामर्श से युधिष्ठिर ने सम्राट-पद की प्राप्ति के लिए राजसूय यज्ञ करने का संकल्प किया।

यज्ञ के लिए आवश्यक धन-सामग्री और अधीनस्थ राजाओं की स्वीकृति हेतु पांडवों ने दिग्विजय की। मगध के शक्तिशाली राजा जरासंध को भीम ने द्वंद्व-युद्ध में पराजित किया; जरासंध के बंदी राजाओं को मुक्त कराया गया।

राजसूय यज्ञ की सभा में सबसे पहले अर्घ्य (सम्मान) किसे दिया जाए, यह प्रश्न उठा। भीष्म आदि वृद्धों के कहने पर श्रीकृष्ण को अग्रपूजा दी गई, जिससे चेदि नरेश शिशुपाल क्रुद्ध हो गया। शिशुपाल ने कृष्ण की कठोर निंदा की और उसने सौ अपराधों की सीमा पार कर दी; तब श्रीकृष्ण के चक्र से उसका वध हुआ।

यह यज्ञ पांडवों की सर्वोच्चता का प्रतीक था, पर इसी वैभव और सम्मान ने दुर्योधन में ईर्ष्या जगाई, जिससे आगे द्यूत-क्रीड़ा और महाभारत युद्ध की भूमिका बनी।

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स्रोत: महाभारत – सभा पर्व