संवत्सर
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: वर्ष, संवत्, संवत्सर-काल
संवत्सर का अर्थ है वर्ष, जो काल-गणना की प्रमुख इकाई है। शास्त्रों में इसे एक देवता के रूप में भी माना गया है, जो समस्त ऋतुओं और मासों को धारण करता है। एक संवत्सर में बारह मास और छह ऋतुएँ मानी गई हैं। इसे यज्ञ और काल-चक्र का प्रतीक माना जाता है।
ऋग्वेद में संवत्सर को प्रजापति के रूप में वर्णित किया गया है। वैदिक परंपरा में पाँच संवत्सरों का एक युग-चक्र माना जाता है — संवत्सर, परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सर और इद्वत्सर। ज्योतिष और पंचांग-गणना में संवत्सर का विशेष महत्व है। इसी से भारतीय संवत् और शक संवत् जैसी गणनाएँ जुड़ी हैं।
संवत्सर का संबंध काल, कल्प, सूर्य और चंद्र से गहरा माना जाता है। सूर्य और चंद्र की गति से ही वर्ष, मास और ऋतुएँ बनती हैं। इस प्रकार संवत्सर काल-गणना और ऋतु-चक्र की आधारभूत इकाई माना जाता है।
संबंधित
स्रोत: ऋग्वेद