चंद्र
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: सोम, शशि, निशाकर, राकेश, हिमकर
चंद्र चंद्रमा के देवता और 'सोम' (अमृत-रस) के अधिष्ठाता हैं। वे नवग्रहों में एक ग्रह हैं और समस्त मन, मनोबल तथा शीतलता के कारक माने जाते हैं। पौराणिक परंपरा में 'चंद्रवंश' (यदु, पुरु, कुरु, कौरव-पांडव आदि) उन्हीं से चला।
उनका रथ तीन पहियों वाला है और उन्हें 'हिमकर', 'निशाकर' और 'शशि' नामों से पुकारा जाता है। उनकी पत्नी रोहिणी (या उनकी प्रमुख पत्नी) तथा अन्य नक्षत्र-कन्याएँ हैं। शिव ने चंद्र को अपने मस्तक पर धारण किया, इसीलिए वे 'चंद्रशेखर' हुए।
प्रसिद्ध प्रसंग — दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 कन्याओं (जो नक्षत्र हैं) का विवाह चंद्र से किया। चंद्र केवल रोहिणी को अधिक स्नेह देने लगे, जिससे शेष 26 की उपेक्षा हुई। क्रुद्ध दक्ष ने चंद्र को क्षय (यक्ष्मा) का श्राप दिया। श्राप से ग्रस्त चंद्र ने प्रभास-तीर्थ में तपस्या कर शिव की उपासना की; शिव ने उन्हें वरदान दिया कि कृष्णपक्ष में वे क्षीण होंगे और शुक्लपक्ष में पुनः वृद्धि पाएँगे — इसी कारण अमावस्या को चंद्र नहीं दिखते। चंद्र का दूसरा प्रसिद्ध प्रसंग बृहस्पति की पत्नी तारा से है, जिससे बुध का जन्म हुआ।
चंद्र की महिमा विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण तथा महाभारत की चंद्रवंशी राजगाथा में विस्तृत है।
नाते-रिश्ते
- पिता: अत्रि
- पत्नी: रोहिणी (व 27 नक्षत्र-कन्याएँ)
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: विष्णु पुराण; श्रीमद्भागवत पुराण; महाभारत