शास्त्रज्ञग्रंथ, पात्र, कथाएँ, स्थान एवं शब्द — एक जगह

हिरण्यगर्भ

वेद एवं पुराण

अन्य नाम: स्वर्ण-अंड, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, स्वर्णगर्भ

सृष्टिब्रह्मावेदब्रह्मांड

हिरण्यगर्भ का शाब्दिक अर्थ है 'स्वर्ण के गर्भ में स्थित'। शास्त्रों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सर्वप्रथम स्वर्ण-अंड (हिरण्यगर्भ) प्रकट हुआ, जिससे समस्त जगत् उत्पन्न हुआ। इसी हिरण्यगर्भ को ब्रह्मा का आदि रूप माना जाता है। इन्हें सृष्टि का आदि बीज और प्रजापति कहा गया है।

ऋग्वेद के प्रसिद्ध 'हिरण्यगर्भ सूक्त' में इनकी स्तुति की गई है, जहाँ इन्हें समस्त भूतों का प्रथम पति कहा गया है। विष्णु पुराण और मनुस्मृति में भी हिरण्यगर्भ से सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है। इन्हें जल में स्थित और सर्वव्यापी माना गया है।

हिरण्यगर्भ का संबंध ब्रह्मा, सृष्टि, ब्रह्मांड और प्रलय से गहरा माना जाता है। ये प्रलय के बाद नई सृष्टि के आरंभ-बिंदु माने जाते हैं। इस प्रकार हिरण्यगर्भ सृष्टि-वर्णन की सबसे प्राचीन और मूल अवधारणा मानी जाती है।

प्रसिद्ध कथन

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। (ऋग्वेद 10.121.1)

संबंधित

ब्रह्मासृष्टिब्रह्मांडविष्णुप्रलय

स्रोत: ऋग्वेद