परशुराम
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: परशुराम, भार्गव, फरसधारी, जमदग्नि-पुत्र, अमर अवतार
परशुराम विष्णु के छठे अवतार हैं — भृगुवंश में जमदग्नि और रेणुका के पुत्र। वे अपने हाथ में सदा रहने वाले परशु (फरसा) के कारण 'परशुराम' कहलाए। उन्हें चिरंजीवी (अमर) सप्त-चिरंजीवियों में गिना जाता है, जो कलियुग में भी जीवित माने जाते हैं और कल्कि अवतार के गुरु होंगे (परंपरा)।
उनकी कथा का केंद्र 'पितृ-वध का प्रतिशोध' है — सहस्रार्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) ने उनके पिता जमदग्नि को मार डाला और आश्रम लूटा। क्रुद्ध परशुराम ने एक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन करने का प्रण लिया और कार्तवीर्य अर्जुन सहित अनेक क्षत्रियों का संहार किया। अंत में भृगु पितरों ने उन्हें रोका, तब उन्होंने युद्ध विराम किया और अस्त्रों को देवताओं को समर्पित कर दिया।
रामायण के अनुसार राम द्वारा शिव-धनुष भंग होने पर परशुराम क्रुद्ध होकर आए; राम ने उनके वैष्णव धनुष को अपने अधिकार में लेकर उनका अहंकार दूर किया, तब परशुराम शांत होकर महेंद्र पर्वत को चले गए। महाभारत में वे भीष्म, द्रोण तथा कर्ण के भी आचार्य माने जाते हैं।
परशुराम की गाथा विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण तथा महाभारत में विस्तृत है।
नाते-रिश्ते
- पिता: जमदग्नि
- माता: रेणुका
- वंश: भृगुवंश
- गुरु: शिव
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: विष्णु पुराण; श्रीमद्भागवत पुराण; महाभारत