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श्रीराम

रामायण एवं रामचरितमानस

अन्य नाम: रामचंद्र, रघुनंदन, मर्यादा पुरुषोत्तम, सीतापति, दाशरथि, रघुकुलभूषण

अयोध्याविष्णु अवताररघुवंशमर्यादा

श्रीराम अयोध्या के सूर्यवंशी (रघुवंशी) राजा दशरथ तथा माता कौशल्या के ज्येष्ठ पुत्र थे। चैत्र शुक्ल नवमी को अयोध्या में उनका जन्म हुआ; त्रेतायुग में विष्णु ने रावण-वध हेतु यह अवतार लिया। उनके तीन भाई — भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न — क्रमशः कैकेयी और सुमित्रा के पुत्र थे। वे महाराज जनक की पुत्री सीता के पति तथा लव-कुश के पिता थे।

बालकाण्ड में विश्वामित्र उन्हें यज्ञ-रक्षा हेतु ले गए; ताड़का-वध, मारीच को समुद्र-पार फेंकना, अहल्या-उद्धार तथा जनकपुर में शिव-धनुष भंग के बाद सीता-स्वयंवर इनके प्रमुख प्रसंग हैं। अयोध्याकाण्ड में कैकेयी के वरदान के कारण पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर वे चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करते हैं; चित्रकूट में भरत उनसे मिलते हैं और उनकी पादुकाएँ सिंहासन पर रखी जाती हैं।

अरण्यकाण्ड में पंचवटी से सीता का हरण होता है; किष्किंधाकाण्ड में हनुमान और सुग्रीव से मैत्री तथा बालि-वध, सुन्दरकाण्ड में हनुमान द्वारा सीता-अन्वेषण, और लंकाकाण्ड में विभीषण को शरण देकर रावण-वध का वर्णन है। उत्तरकाण्ड में अयोध्या-वापसी, राज्याभिषेक (राम-राज्य), सीता-परित्याग तथा लव-कुश के द्वारा पुनर्मिलन के प्रसंग हैं।

वे 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहलाए — सत्य, धर्म, पितृभक्ति, प्रजापालन और एकपत्नीव्रत के आदर्श। उनकी वचन-निष्ठा इतनी दृढ़ थी कि रघुकुल के लिए कहा गया — 'प्राण जाहुँ बरु बचनु न जाई'। तुलसीदास ने उन्हें 'सिय-राममय सब जग जानी' कहकर सगुण ब्रह्म की उपासना का केंद्र बनाया।

नाते-रिश्ते

  • पिता: दशरथ
  • माता: कौशल्या
  • पत्नी: सीता
  • भाई: भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न
  • पुत्र: लव, कुश

प्रसिद्ध कथन

"रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाहुँ बरु बचनु न जाई॥" (रामचरितमानस — रघुकुल की वचन-निष्ठा का प्रसिद्ध कथन)
विभीषण को आश्वासन: "जो मेरी शरण में आता है, उसे मैं अभय करता हूँ।" — 'सरणागत वत्सल' भाव। (भावानुवाद)
"अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥" (परंपरा-प्रसिद्ध श्लोक; जन्मभूमि की महिमा)

संबंधित

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स्रोत: वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड; रामचरितमानस – बालकाण्ड