बृहस्पति
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: बृहस्पति, देवगुरु, अंगिरा-पुत्र, गुरु ग्रह
बृहस्पति अंगिरा ऋषि के पुत्र, देवताओं के गुरु और नवग्रहों में 'गुरु' (बृहस्पति/जुपिटर) ग्रह हैं। वे देवसभा के प्रमुख पुरोहित तथा ज्ञान व नीति के आचार्य हैं — इंद्र के साथ उनकी भूमिका देव-राज्य के मंत्री और परामर्शदाता की रही। 'गुरुवार' का दिन उन्हीं को समर्पित है।
उनका प्रसिद्ध प्रसंग चंद्र के साथ तारा का है — चंद्र ने बृहस्पति की पत्नी तारा का हरण किया, जिससे देवताओं व ऋषियों में युद्ध तक की स्थिति बनी। ब्रह्मा के हस्तक्षेप से तारा लौटीं, पर उनके गर्भ से बुध का जन्म हुआ — जिसे विवाद के कारण बृहस्पति और चंद्र दोनों अपना पुत्र मानते हैं। अंततः बुध चंद्र के पुत्र स्वीकृत हुए।
उनका दूसरा प्रसिद्ध प्रसंग बृहस्पति-शिष्य कच तथा शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या सीखने का है। वे देवताओं के लिए यज्ञ-विधान और नीति के प्रमुख प्रणेता माने जाते हैं। बृहस्पति-स्मृति (नीति-शास्त्र) की परंपरा भी उनके नाम से जुड़ी है।
बृहस्पति की गाथा विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण में मिलती है।
नाते-रिश्ते
- पिता: अंगिरा
- पत्नी: तारा
- पुत्र: बुध (विवादित)
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: विष्णु पुराण; श्रीमद्भागवत पुराण