भीष्म
महाभारत
अन्य नाम: गंगापुत्र, देवव्रत, शांतनव, पितामह, भीष्म
भीष्म गंगा और राजा शांतनु के पुत्र थे; जन्म के समय उनका नाम देवव्रत था। गंगा ने आठवें पुत्र के रूप में उन्हें शांतनु को सौंपा और स्वर्ग चली गईं। पिता के सुख के लिए उन्होंने सत्यवती के विवाह हेतु राज्य का अधिकार त्याग दिया और भीषण ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली — इसी अटल प्रतिज्ञा के कारण वे ‘भीष्म’ कहलाए।
वे काशिराज की तीनों कन्याओं — अंबा, अंबिका और अंबालिका — का हरण करके लाए, जिससे अंबा उनके प्रति क्रुद्ध हुई और बाद में शिखंडी के रूप में उनके वध का कारण बनी। भीष्म ने हस्तिनापुर की रक्षा और कुरुवंश की निरंतरता को जीवन का ध्येय बनाया; उन्होंने पांडवों और कौरवों दोनों को पाला और राजसूय तथा युद्ध में भी कुरुवंश की एकता चाही।
कुरुक्षेत्र में वे कौरव-सेना के प्रथम सेनापति बने और दस दिनों तक अद्वितीय पराक्रम दिखाया। शिखंडी को सामने देखकर उन्होंने शस्त्र त्याग दिए, क्योंकि अंबा के पुरुष-रूप के विरुद्ध वे शस्त्र न उठा सके। वे शरशय्या पर लेटे और वहीं से युधिष्ठिर को राजधर्म, दान, मोक्ष आदि का विस्तृत उपदेश दिया (शांति एवं अनुशासन पर्व)। उत्तरायण में उन्होंने देह त्यागी।
नाते-रिश्ते
- पिता: शांतनु, माता: गंगा
- सौतेली माता: सत्यवती
- भाई: विचित्रवीर्य, चित्रांगद
- गुरु: परशुराम
- कुलपति: कौरव-पांडवों के पितामह
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
पूर्वजन्म में वसु (द्यौ/प्रभास) थे; वसिष्ठ के शाप से भीष्म रूप में जन्मे।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: महाभारत – भीष्म पर्व; शांति पर्व