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कर्ण

महाभारत

अन्य नाम: सूर्यपुत्र, राधेय, अंगराज, वैकर्तन, कुंतीपुत्र, वसुषेण

सूर्यदानवीरअंगराजकवच-कुंडलकुरुक्षेत्र

कर्ण कुंती के पुत्र थे, जिन्हें उन्होंने सूर्यदेव से मंत्र के प्रभाव से प्राप्त किया और लोक-लाज के भय से त्याग दिया। सारथी अधिरथ और राधा ने उसका पालन किया, इसीलिए वे ‘राधेय’ कहलाए। जन्म से ही कवच और कुंडल धारण किए हुए कर्ण अस्त्र-विद्या में अत्यंत निपुण थे।

परशुराम से उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण करके अस्त्र-विद्या सीखी, पर ब्राह्मणत्व के छल का पता चलने पर परशुराम ने उन्हें शाप दिया। इंद्र ने कवच-कुंडल माँगे, जो उन्होंने बिना हिचक दान कर दिए। द्रौपदी-स्वयंवर में उन्हें ‘सूतपुत्र’ कहकर अपमानित किया गया, जिसके बाद दुर्योधन ने उन्हें अंग देश का राजा बनाया। कर्ण दुर्योधन के प्राण-प्रिय मित्र रहे।

कुरुक्षेत्र में वे कौरव-सेना के सेनापति बने और घटोत्कच का वध उन्होंने इंद्र के दिए शक्ति-अस्त्र से किया। अंतिम युद्ध में जब उनका रथ कीचड़ में फँस गया, तब अर्जुन ने उनका वध किया। जीवनपर्यन्त अपमान सहते हुए भी कर्ण ने दान, वीरता और मित्र-निष्ठा का आदर्श प्रस्तुत किया; युद्ध से पूर्व कुंती को दिए वचन से उनका त्याग और गरिमा सर्वाधिक प्रकट होती है।

नाते-रिश्ते

  • पिता: सूर्यदेव, माता: कुंती
  • पालक: अधिरथ, राधा
  • भाई: युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव
  • पत्नी: वृषाली, पुत्र: वृषसेन
  • मित्र: दुर्योधन, गुरु: परशुराम

पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध

पूर्वजन्म में सहस्रकवच दैत्य थे; सूर्य के अंश से कर्ण रूप में जन्मे।

प्रसिद्ध कथन

दानवीरता (भावानुवाद) — इंद्र के ब्राह्मण-वेश में आने पर कर्ण ने बिना संकोच कहा, “जो कुछ माँगोगे वही दूँगा; कवच-कुंडल ही क्यों न हो, दान कभी नहीं लौटाता।”
कुंती को दिया वचन (भावानुवाद) — “मैं आपके चार पुत्रों को नहीं मारूँगा, केवल अर्जुन के साथ युद्ध करूँगा।”

संबंधित

कुंतीसूर्यदुर्योधनअर्जुनद्रोणाचार्यपरशुराम

स्रोत: महाभारत – आदि पर्व; कर्ण पर्व