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मत्स्य अवतार

वेद एवं पुराण

अन्य नाम: मत्स्य, प्रथम अवतार, मछली अवतार, प्रलय-रक्षक

अवतारविष्णुप्रलयमनु

मत्स्य अवतार विष्णु के दशावतारों में प्रथम है — मछली का रूप। इसका प्रयोजन प्रलय (जल-प्लावन) के समय सृष्टि के बीज और वेदों की रक्षा करना था। इस अवतार की कथा मत्स्य पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तृत है और विश्व की अनेक संस्कृतियों की 'जल-प्रलय' कथाओं से मिलती-जुलती है।

कथा के अनुसार वैवस्वत मनु नदी में जल-तर्पण कर रहे थे, तभी एक छोटी मछली उनकी अंजुलि में आई और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। मनु ने उसे कमंडल में रखा, पर मछली बढ़ती गई — क्रमशः कुएँ, तालाब, नदी और अंततः समुद्र में पहुँची। मछली ने मनु को बताया कि सात दिन में प्रलय आएगा; तब मनु ने सप्तर्षियों, समस्त बीज-औषधियों तथा प्राणियों के युग्म को एक नाव में बिठाया।

मत्स्य ने नाव को अपने विशाल शृंग से बाँधकर प्रलय-जल में सुरक्षित पार पहुँचाया। माना जाता है कि मत्स्य ने हयग्रीव नामक दैत्य से वेदों को छीनकर उनकी रक्षा की भी। इस प्रकार मत्स्य अवतार ने प्रलयोत्तर सृष्टि का आधार रखा।

मत्स्य अवतार की कथा मत्स्य पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण (अष्टम स्कंध) में वर्णित है।

नाते-रिश्ते

  • अवतार: विष्णु (प्रथम)
  • रक्षित: मनु

प्रसिद्ध कथन

मत्स्य अवतार का प्रयोजन — प्रलय के जल में डूबते जगत्, सृष्टि-बीज तथा वेदों की रक्षा। (भावानुवाद)
कथा के अनुसार मत्स्य ने मनु से कहा — सातवें दिन प्रलय आएगा, तब तुम नाव बनाकर सप्तर्षियों सहित सृष्टि-बीज सुरक्षित रखना। (भावानुवाद)
मंत्र — "ॐ मत्स्याय नमः।"

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मनुकूर्म अवतारवराह अवतारनरसिंह अवतारविष्णुअवतार

स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण; मत्स्य पुराण