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मौसल संहार

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: मौसल पर्व, यादव संहार, मुसल युद्ध

यदुवंशकृष्णबलराम

युद्ध के छत्तीसवें वर्ष में द्वारका में अनेक अपशकुन दिखने लगे। सांब आदि युवकों ने विश्वामित्र, कण्व और नारद ऋषियों का उपहास किया, जिससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने शाप दिया कि सांब के उदर से उत्पन्न लौह-मूसल से वृष्णि और अन्धक वंश नष्ट होगा।

अगले दिन सांब ने वह लौह-मूसल उत्पन्न किया। राजा उग्रसेन ने उसे पिसवाकर समुद्र में फिंकवा दिया और मदिरा का निषेध कर दिया। वह चूर्ण समुद्र-तट पर एरका घास के रूप में उग आया।

श्रीकृष्ण ने समय जानकर यादवों को प्रभास तीर्थ की यात्रा पर ले गए। वहाँ उत्सव में मदिरा के नशे में सात्यकि और कृतवर्मा में विवाद हुआ और सात्यकि ने कृतवर्मा का वध कर दिया। इसके बाद यादव आपस में लड़ने लगे।

हाथ में आते ही एरका की घास वज्र जैसी मूसल बन जाती थी। इस युद्ध में यदुवंशी एक-दूसरे को मार डाले। बलराम ने योग-समाधि से शेषनाग रूप में समुद्र में प्रवेश करके देह त्याग की, और वन में ध्यानमग्न श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिये ने मृग समझकर बाण मारा। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने देह त्याग किया और द्वारका समुद्र में समा गई।

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स्रोत: महाभारत – मौसल पर्व