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गांधारी

महाभारत

अन्य नाम: सौबलेयी, गांधारराजपुत्री, गांधारी

गांधारहस्तिनापुरपतिव्रतापुत्रशोकशाप

गांधारी गांधारराज सुबल की पुत्री और शकुनि की बहन थीं। विवाह के समय जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके वर धृतराष्ट्र अंधे हैं, तब उन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और जीवनपर्यन्त उसे नहीं खोला — यह उनके पतिव्रत-त्याग का प्रतीक है। वे सौ पुत्रों की माता बनीं, जिनमें दुर्योधन ज्येष्ठ थे।

गांधारी ने चीरहरण के समय दुर्योधन की भर्त्सना की, परंतु वे भी पुत्र-मोह से मुक्त न हो सकीं। युद्ध में उनके सौ पुत्र मारे गए, जिससे उनका हृदय टूट गया। दुर्योधन की मृत्यु के बाद शोकाकुल गांधारी ने कृष्ण को शाप दिया कि जैसे कुरुवंश का नाश हुआ, वैसे ही छत्तीस वर्ष बाद यदुवंश का भी संहार होगा — यह शाप बाद में सत्य हुआ।

वे धृतराष्ट्र, कुंती और विदुर के साथ वन गईं और तपस्विनी के रूप में वहीं उनका देहावसान हुआ। गांधारी धैर्य, त्याग और पत्नी-माता के गहन कर्तव्य-बोध की प्रतिमूर्ति हैं, परंतु पुत्रमोह उनकी भी सीमा बना।

नाते-रिश्ते

  • पिता: सुबल (गांधारराज)
  • भाई: शकुनि
  • पति: धृतराष्ट्र
  • पुत्र: दुर्योधन आदि १००

पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध

पूर्वजन्म में देवी मति (धैर्य की देवी) थीं; गांधारी रूप में जन्मीं।

प्रसिद्ध कथन

कृष्ण को शाप (भावानुवाद) — “जैसे मेरे सौ पुत्रों का नाश हुआ, वैसे ही छत्तीस वर्ष बाद तेरे यदुवंश का भी संहार होगा।”
चीरहरण के समय दुर्योधन को चेतावनी (भावानुवाद) — “हे पुत्र, धर्म का त्याग करके तुझे कभी कल्याण नहीं मिलेगा।”

संबंधित

धृतराष्ट्रशकुनिदुर्योधनश्रीकृष्णकुंतीहस्तिनापुर

स्रोत: महाभारत – आदि पर्व; स्त्री पर्व