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युधिष्ठिर

महाभारत

अन्य नाम: धर्मराज, धर्मपुत्र, अजातशत्रु, कुंतीपुत्र, भारत

पांडवधर्मसत्यइंद्रप्रस्थराजा

युधिष्ठिर कुंती और यमराज (धर्मराज) के पुत्र तथा पाँचों पांडवों में ज्येष्ठ थे, इसीलिए ‘धर्मराज’ कहलाए। सत्य, संयम और धर्म-पालन के कारण वे ‘अजातशत्रु’ (जिसका कोई शत्रु न हो) कहलाए। हस्तिनापुर में शिक्षा पूर्ण होने पर युवराज बने और बाद में खांडवप्रस्थ को जीतकर वहाँ इंद्रप्रस्थ नगरी बसाई।

सम्राट बनने पर उन्होंने राजसूय यज्ञ किया, जिसमें जरासंध-वध और शिशुपाल-वध हुआ और दुर्योधन का अपमान हुआ। शकुनि के कपट-द्यूत में उन्होंने अपना राज्य, भाई और द्रौपदी तक हार दिया। बारह वर्ष वनवास तथा एक वर्ष अज्ञातवास में विराट नगर में ‘कंक’ नामक द्यूत-क्रीड़क बने। वनवास-काल में प्रसिद्ध यक्ष-प्रश्न प्रसंग हुआ, जिसमें यक्ष ने उनके भाइयों को मार डाला और युधिष्ठिर ने सभी प्रश्नों के उत्तर देकर उन्हें जीवित कराया।

कुरुक्षेत्र में वे पांडव-सेना के नायक थे और युद्ध की अधिकांश नीति उन्हीं की सहमति से बनी। उनका एक कलंक भी है — द्रोण को रोकने के लिए उन्होंने ‘अश्वत्थामा हतः’ कहा, जो छलपूर्ण अर्ध-सत्य था। युद्ध के बाद वे हस्तिनापुर के सम्राट बने, अश्वमेध यज्ञ किया और वृद्धावस्था में भाइयों तथा द्रौपदी के साथ महाप्रस्थान करके हिमालय की ओर चले, जहाँ द्रौपदी, भाई और वे स्वयं क्रमशः गिर पड़े।

नाते-रिश्ते

  • पिता: पांडु (देवता: धर्मराज), माता: कुंती
  • भाई: भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव
  • पत्नी: द्रौपदी
  • गुरु: द्रोणाचार्य
  • पुत्र: प्रतिविंध्य

पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध

धर्मराज (यम) के अंश से जन्मे; पूर्वजन्म में धर्म के अंश थे।

प्रसिद्ध कथन

यक्ष-प्रश्न के उत्तर में उनका प्रसिद्ध वाक्य — “महाजनो येन गतः स पन्थाः” अर्थात् जिस मार्ग से महापुरुष गए हैं, वही मार्ग है।
यक्ष ने मृत भाइयों में से एक को जीवित करने का वर दिया; युधिष्ठिर ने नकुल को चुना, क्योंकि कुंती के पुत्र तो जीवित थे — यह उनके न्याय का उदाहरण है।
द्रोण के सम्मुख कहा गया वाक्य — “अश्वत्थामा हतः (कुञ्जरः)” — इसी अर्ध-सत्य के कारण द्रोण ने शस्त्र त्यागे।

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भीमअर्जुनद्रौपदीद्रोणाचार्यधर्महस्तिनापुर

स्रोत: महाभारत – वन पर्व; द्रोण पर्व