शास्त्रज्ञशास्त्रों के ग्रंथ, पात्र, कथाएँ, स्थान और शब्द — एक जगह

पांडवों का स्वर्गारोहण

कथाएँ एवं घटनाएँ

अन्य नाम: स्वर्गारोहण, महाप्रस्थान

स्वर्गारोहणमहाप्रस्थानयुधिष्ठिर

मौसल-संहार और श्रीकृष्ण के देहत्याग का समाचार सुनकर पांडव संसार से विरक्त हो गए। उन्होंने परीक्षित को हस्तिनापुर का राजा बनाकर महाप्रस्थान (अंतिम यात्रा) का संकल्प किया।

युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी हिमालय की ओर चले। मार्ग में एक-एक करके द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम गिर पड़े।

युधिष्ठिर ने बताया कि द्रौपदी अर्जुन पर अधिक मोह रखने के कारण, सहदेव अपने ज्ञान के अभिमान के कारण, नकुल रूप-गर्व के कारण, अर्जुन अपनी धनुर्धरता के अहंकार के कारण और भीम अत्यधिक भोजन तथा बल-गर्व के कारण गिरे।

अंत में युधिष्ठिर अकेले आगे बढ़े; साथ में एक श्वान भी था। इंद्र ने युधिष्ठिर को स्वर्ग में आमंत्रित किया, पर युधिष्ठिर ने श्वान सहित आने का आग्रह किया। वह श्वान वस्तुतः धर्मदेव थे। स्वर्ग में युधिष्ठिर ने अपने शत्रुओं (कौरवों) को देखा, पर अपने भाइयों को नहीं; तब उन्होंने भाइयों के बिना स्वर्ग में रहने से इनकार किया। अंत में युधिष्ठिर ने देह त्याग कर स्वर्ग में प्रवेश किया और अपने भाइयों तथा द्रौपदी से मिले।

प्रसिद्ध कथन

युधिष्ठिर का वचन — 'जिन भाइयों और द्रौपदी के बिना मैं रह नहीं सकता, उनके बिना मैं स्वर्ग को भी नहीं चाहता।' (भावानुवाद)

संबंधित

युधिष्ठिरद्रौपदीभीमअर्जुननकुलसहदेव

स्रोत: महाभारत – महाप्रस्थानिक पर्व, स्वर्गारोहण पर्व