अर्जुन
महाभारत
अन्य नाम: धनंजय, पार्थ, सव्यसाची, किरीटी, गुडाकेश, बीभत्सु
अर्जुन कुंती और देवराज इंद्र के पुत्र तथा पाँचों पांडवों में तीसरे थे। द्रोणाचार्य के आश्रम में उन्होंने अस्त्र-विद्या में अद्वितीय निपुणता प्राप्त की और अपने गुरु के सबसे प्रिय शिष्य बने। रात्रि में अकेले धनुर्विद्या का अभ्यास करते हुए उन्हें द्रोण ने पकड़ा, जिससे प्रभावित होकर गुरु ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का आशीर्वाद दिया। द्रौपदी के स्वयंवर में मत्स्य-वेध करके उन्होंने द्रौपदी को प्राप्त किया।
राजसूय यज्ञ के समय कृष्ण के साथ उन्होंने जरासंध-वध में सहयोग दिया। द्यूत में पांडवों की पराजय के बाद बारह वर्ष के वनवास में अर्जुन ने इंद्र के आशीर्वाद से दिव्य अस्त्र प्राप्त किए और एक वर्ष के अज्ञातवास में वे विराट नगर में बृहन्नला नामक नपुंसक वेशधारी नृत्य-गुरु बने। इसी काल में उत्तरा को विद्या दी और गोग्रहण युद्ध में अकेले कौरव सेना को परास्त किया।
कुरुक्षेत्र में कृष्ण उनके सारथी बने और युद्ध से पूर्व उन्हें भगवद्गीता का उपदेश मिला। उन्होंने भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी, जयद्रथ की प्रतिज्ञा पूरी की और कर्ण का वध किया। उनका अहंकार भी प्रकट हुआ — एकलव्य से अंगूठा माँगने में वे द्रोण के निमित्त थे, और अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदन की पूरी विद्या न बता पाने का शोक उन्होंने स्वयं सहा। सुभद्रा से उनके पुत्र अभिमन्यु और अभिमन्यु से परीक्षित का जन्म हुआ।
नाते-रिश्ते
- पिता: पांडु (देवता: इंद्र), माता: कुंती
- भाई: युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव
- पत्नी: द्रौपदी, सुभद्रा
- पुत्र: अभिमन्यु
- गुरु: द्रोणाचार्य, सखा: श्रीकृष्ण
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
पूर्वजन्म में नर ऋषि (नर-नारायण के अंश) थे; इंद्र के अंश से जन्मे।
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: महाभारत – आदि पर्व; भगवद्गीता