भीष्म पर्व
ग्रंथ
अन्य नाम: भीष्मपर्व, भीष्म पर्व, षष्ठ पर्व
रचयिता / कर्ता: वेदव्यास / वैशंपायन-सूत
भीष्म पर्व महाभारत का छठा पर्व है, जिससे कुरुक्षेत्र युद्ध का प्रारंभ होता है। भीष्म पितामह कौरव-सेना के प्रथम सेनापति बनते हैं।
युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन का मोह और विषाद उत्पन्न होता है, और तब श्रीकृष्ण अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश देते हैं — जिसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का सार है।
इस पर्व में दस दिनों के युद्ध का वर्णन है, जिसमें भीष्म दोनों पक्षों के लिए अजेय रहते हैं। अंत में अर्जुन, शिखंडी की सहायता से भीष्म को बाणों की शय्या पर लिटा देते हैं।
भीष्म की शर-शय्या और उनका उपदेश आगे के पर्वों में आता है। यह पर्व भगवद्गीता के कारण हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रसिद्ध कथन
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ (भगवद्गीता 1.1)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (भगवद्गीता 2.47) — भाव: 'कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी नहीं।'
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स्रोत: महाभारत, भीष्म पर्व (भगवद्गीता सहित)