भीष्म की शरशय्या
कथाएँ एवं घटनाएँ
अन्य नाम: भीष्म पतन, शरशय्या, भीष्म वध
युद्ध के दसवें दिन कौरवों के सेनापति भीष्म अकेले पांडव-सेना का संहार कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे पांडवों पर स्वयं बाण नहीं चलाएँगे और शिखंडी पर भी बाण नहीं चलाएँगे।
शिखंडी पूर्वजन्म में अम्बा थी, जिसने भीष्म से प्रतिशोध का व्रत लिया था। पांडवों की ओर से अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके भीष्म पर बाणों की वर्षा की।
भीष्म ने शिखंडी पर बाण न चलाने की प्रतिज्ञा के कारण शस्त्र नहीं उठाए और अर्जुन के बाणों से वे बाणों की शय्या पर गिर पड़े। यह दृश्य देखकर दोनों सेनाओं में शोक और विस्मय फैल गया।
शरशय्या पर पड़े भीष्म ने पांडवों को आशीर्वाद दिया और अंतिम इच्छा प्रकट की कि वे उत्तरायण (सूर्य के उत्तर दिशा में गमन) के समय तक प्राण धारण करेंगे। बाद में भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्षधर्म आदि का उपदेश दिया और उत्तरायण में देह त्याग किया।
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स्रोत: महाभारत – भीष्म पर्व