वासुकि
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: वासुकि, वासुकि नाग, नागराज वासुकि
वासुकि नागों के राजा माने जाते हैं। समुद्र मंथन में मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि को रस्सी (नेती) बनाया गया; देवता उनके मुख की ओर और असुर पूँछ की ओर खड़े हुए।
मंथन के समय वासुकि के विष और थकान से उत्पन्न कष्ट को शिव ने शांत किया। कुछ वर्णनों में उनके मुख से विषयुक्त धुआँ निकलने और देवताओं को पीड़ा होने की बात मिलती है।
परंपरा में वासुकि को कश्यप और कद्रू की संतान (नाग-वंश) माना जाता है; शेषनाग उनके भाई या सहोदर माने जाते हैं। वे शिव के गले के आभूषण तथा उनकी कृपा के पात्र भी बताए जाते हैं।
महाभारत के आदि पर्व में वासुकि के वंश और नाग-कुल की लंबी सूची मिलती है। समुद्र मंथन के प्रसंग में उनकी भूमिका केंद्रीय है।
नाते-रिश्ते
- पिता: कश्यप
- माता: कद्रू
- भाई: शेषनाग
- संबंधी: शिव
- भूमिका: मंथन की रस्सी
संबंधित
स्रोत: समुद्र मंथन प्रसंग, महाभारत (आदि पर्व), विष्णु पुराण