समुद्र मंथन
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: समुद्र मंथन, क्षीरसागर मंथन, अमृत-मंथन, देव-दानव मंथन
समुद्र मंथन (क्षीरसागर मंथन) पुराणों की सर्वाधिक प्रसिद्ध घटनाओं में से एक है, जिसमें देवताओं और दानवों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया। यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण (अष्टम स्कंध), विष्णु पुराण तथा महाभारत में विस्तृत है।
मंथन का कारण दुर्वासा मुनि का इंद्र को दिया श्राप था, जिससे देवताओं का बल व लक्ष्मी क्षीण हो गई। तब भगवान विष्णु की सलाह से देव-दानवों ने संधि की। मंथन के साधन थे — मंदराचल पर्वत (मथनी), वासुकि नाग (रस्सी), और भगवान का कूर्म अवतार जिसने पर्वत को पीठ पर धारण किया। देवताओं ने वासुकि का मुख और दानवों ने पूँछ पकड़ी।
मंथन से क्रमशः चौदह रत्न प्रकट हुए — प्रथम भयंकर हलाहल विष, जिसे भगवान शिव ने पीकर कंठ में रोका और 'नीलकंठ' कहलाए। इसके बाद कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, अप्सराएँ (रंभा आदि), लक्ष्मी, वारुणी (मदिरा), चंद्र, शंख, धनुष, औषधियाँ, और अंत में धन्वंतरि हाथ में अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए। लक्ष्मी ने विष्णु को वरण किया।
अमृत पर देव-दानवों में विवाद हुआ, तब भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत का वितरण किया और देवताओं को अमरत्व दिया। इस प्रसंग में राहु ने छल से अमृत पिया, पर सूर्य-चंद्र की सूचना पर उसका सिर काटा गया — जिससे राहु-केतु उत्पन्न हुए। इस प्रकार समुद्र मंथन ने देवताओं को अमरत्व तथा अनेक दिव्य रत्न प्रदान किए।
नाते-रिश्ते
- सम्बन्ध: देव-दानव
- रत्न: लक्ष्मी, चंद्र, धन्वंतरि
- विष: हलाहल
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 8); विष्णु पुराण; महाभारत