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मनु

वेद एवं पुराण

अन्य नाम: वैवस्वत मनु, स्वायंभुव मनु, प्रथम पुरुष, मनुस्मृति-कर्ता

राजाप्रजापतिधर्मशास्त्रमानव

मनु मानव-जाति के आदि पुरुष और धर्मशास्त्र 'मनुस्मृति' के रचयिता हैं — 'मनु' शब्द से ही 'मानव' और 'मनुष्य' बने। पुराणों के अनुसार एक कल्प में चौदह मनु होते हैं; वर्तमान में सातवें मनु 'वैवस्वत मनु' (सूर्य के पुत्र) राज्य कर रहे हैं, और प्रथम मनु 'स्वायंभुव मनु' (ब्रह्मा से उत्पन्न) थे।

वैवस्वत मनु सूर्य के पुत्र हैं और उनकी संतान से इक्ष्वाकु, रघु, राम आदि सूर्यवंशी राजाओं की परंपरा चली। स्वायंभुव मनु की पत्नी शतरूपा थीं और उनसे प्रियव्रत, उत्तानपाद (ध्रुव के पिता) आदि संतानें हुईं। मनु का स्वरूप धर्मात्मा राजा-प्रजापति का है।

प्रसिद्ध प्रसंग 'मत्स्य अवतार' है — जब प्रलय का जल आने वाला था, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य (मछली) रूप में मनु को चेतावनी दी। मनु ने मछली को बढ़ाकर समुद्र में छोड़ा, फिर एक नाव पर समस्त औषधियाँ, बीज तथा सप्तर्षियों को बिठाकर मत्स्य के शृंग से नाव बाँधी और प्रलय से बचे। माना जाता है कि मत्स्य ने हयग्रीव राक्षस से वेदों की रक्षा भी की। इस प्रकार मनु से ही प्रलयोत्तर सृष्टि का पुनः आरम्भ हुआ।

मनु की गाथा मनुस्मृति, विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तृत है।

नाते-रिश्ते

  • पिता: सूर्य (वैवस्वत)
  • पत्नी: शतरूपा

प्रसिद्ध कथन

मनुस्मृति (8.15) — "धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥" अर्थात् नष्ट किया गया धर्म नष्ट करता है, रक्षित धर्म रक्षा करता है।
मत्स्य अवतार में भगवान ने मनु को प्रलय की सूचना दी और नाव पर सृष्टि-बीज सुरक्षित रखने को कहा। (भावानुवाद)
मंत्र — "ॐ मनवे नमः।"

संबंधित

मत्स्य अवतारसूर्यब्रह्माकश्यपभगीरथअयोध्या

स्रोत: मनुस्मृति; विष्णु पुराण; श्रीमद्भागवत पुराण