वराह अवतार
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: वराह, शूकर अवतार, तृतीय अवतार, भूमि-उद्धारक
वराह अवतार विष्णु के दशावतारों में तृतीय है — सूकर (वराह) का रूप। इसका प्रयोजन पृथ्वी को रसातल से उबारना और दैत्य हिरण्याक्ष का संहार करना था। कथा के अनुसार हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को उठाकर रसातल (समुद्र की गहराई) में छिपा दिया, जिससे सृष्टि संकट में पड़ गई।
भगवान ने विशाल वराह रूप धारण किया और समुद्र में उतरकर हिरण्याक्ष से भीषण युद्ध किया। यह युद्ध सहस्र (हज़ार) वर्षों तक चला माना जाता है। अंत में भगवान ने हिरण्याक्ष का वध किया और अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को धारण कर उसे पुनः अपने स्थान पर स्थापित किया।
पृथ्वी यहाँ 'भूदेवी' (भूमि) के रूप में भगवान की पत्नी मानी गई हैं; वराह अवतार में भगवान ने उन्हें दाढ़ों पर उठाया और उनके साथ उनका मिलन हुआ। कहीं-कहीं वराह-रूप का पुत्र 'नरकासुर' भी बताया गया है।
वराह अवतार की कथा श्रीमद्भागवत पुराण (तृतीय स्कंध) तथा विष्णु पुराण में विस्तृत है। वराह को परंपरा में उद्धार और पृथ्वी-रक्षा का प्रतीक माना गया है।
नाते-रिश्ते
- अवतार: विष्णु (तृतीय)
- पत्नी: भूदेवी
- शत्रु: हिरण्याक्ष
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 3); विष्णु पुराण