प्रह्लाद
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: भक्त प्रह्लाद, प्रह्लाद, दैत्यराज, नारायण-भक्त
प्रह्लाद विष्णु के परम भक्तों में अग्रगण्य हैं। वे दैत्यराज हिरण्यकशिपु और रानी कयाधु के पुत्र थे, पर जन्म से ही उनका हृदय नारायण-भक्ति में रमा था। उनकी भक्ति ने पिता के अत्याचार, बार-बार मृत्यु के प्रयास, तथा समस्त दैत्य-द्वेष को निष्फल कर दिया — और अंततः नरसिंह अवतार का कारण बनी।
कथा के अनुसार जब प्रह्लाद गर्भ में थे, तब देवर्षि नारद ने उनकी माता को भक्ति का उपदेश दिया; गर्भस्थ प्रह्लाद ने उसे ग्रहण कर लिया। जन्म के बाद वे सदा 'नारायण-नारायण' जपते रहे। पिता ने उन्हें विष, अग्नि, हाथी के पैरों तले कुचलना, सर्पों से डसवाना और पर्वत से गिराना — अनेक प्रयास किए, पर हर बार भगवान ने उनकी रक्षा की।
अंत में हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा कि उसका हरि कहाँ है; प्रह्लाद ने कहा वह सर्वत्र है, स्तंभ में भी। तब भगवान नरसिंह उसी स्तंभ से प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु का वध किया। प्रह्लाद आगे दैत्यों के धर्मात्मा राजा हुए और उनका पौत्र राजा बलि हुआ।
प्रह्लाद की कथा श्रीमद्भागवत पुराण के सातवें स्कंध और विष्णु पुराण में विस्तार से वर्णित है। भागवत में प्रह्लाद द्वारा बताई गई नवधा भक्ति प्रसिद्ध है।
नाते-रिश्ते
- पिता: हिरण्यकशिपु
- माता: कयाधु
- पौत्र: राजा बलि
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 7); विष्णु पुराण