हिरण्यकशिपु
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: हिरण्यकशिपु, दैत्यराज, प्रह्लाद-पिता, नरसिंह-शत्रु
हिरण्यकशिपु दैत्यों का प्रतापी और अत्याचारी राजा था — कश्यप और दिति का पुत्र तथा हिरण्याक्ष का भाई। जब भगवान वराह ने उसके भाई हिरण्याक्ष का वध किया, तब हिरण्यकशिपु ने विष्णु से बदला लेने का प्रण किया और घोर तपस्या से ब्रह्मा को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त किया।
उसका वरदान यह था कि उसकी मृत्यु न मनुष्य से हो, न पशु से; न दिन में, न रात में; न भीतर, न बाहर; न भूमि पर, न आकाश में; न किसी अस्त्र से। इस वरदान के बल पर वह तीनों लोकों में उत्पात मचाने लगा और स्वयं को भगवान के समान मानने लगा। उसने देवताओं को हराकर उनके यज्ञ-भाग छीन लिए।
हिरण्यकशिपु का अंत उसी के पुत्र प्रह्लाद की भक्ति से जुड़ा — जब प्रह्लाद ने स्तंभ में भगवान की उपस्थिति बताई, तब नरसिंह (आधे मनुष्य-आधे सिंह) उसी स्तंभ से प्रकट हुए। सायंकाल (न दिन न रात), द्वार की देहली पर (न भीतर न बाहर), नरसिंह की गोद में (न भूमि न आकाश), अपने नखों से (न अस्त्र से) — इस प्रकार सभी शर्तें पूरी करते हुए भगवान ने उसका वध किया।
हिरण्यकशिपु की कथा श्रीमद्भागवत पुराण के सातवें स्कंध तथा विष्णु पुराण में विस्तृत है।
नाते-रिश्ते
- पिता: कश्यप
- माता: दिति
- भाई: हिरण्याक्ष
- पुत्र: प्रह्लाद
पूर्वजन्म एवं प्रारब्ध
जय-विजय (विष्णु के द्वारपाल)
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 7); विष्णु पुराण