नरसिंह अवतार
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: नरसिंह, नृसिंह, चतुर्थ अवतार, प्रह्लाद-रक्षक
नरसिंह अवतार विष्णु के दशावतारों में चतुर्थ है — आधे मनुष्य और आधे सिंह (नर + सिंह) का रूप। इसका प्रयोजन भक्त प्रह्लाद की रक्षा और अत्याचारी दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वध था। यह अवतार भक्ति की विजय तथा अहंकार के विनाश का प्रतीक है।
हिरण्यकशिपु को ब्रह्मा से वरदान था कि उसकी मृत्यु न मनुष्य से हो, न पशु से; न दिन में, न रात में; न भीतर, न बाहर; न भूमि पर, न आकाश में; न किसी अस्त्र से। अतः जब प्रह्लाद ने कहा कि भगवान स्तंभ में भी हैं, तब भगवान नरसिंह सायंकाल (न दिन न रात) उसी स्तंभ से प्रकट हुए — न मनुष्य न पशु।
भगवान ने हिरण्यकशिपु को द्वार की देहली पर (न भीतर न बाहर), अपनी गोद में (न भूमि न आकाश) रखकर अपने नखों से (न अस्त्र से) चीर डाला — इस प्रकार वरदान की प्रत्येक शर्त भंग हो गई। वध के बाद भी भगवान का क्रोध शांत नहीं हुआ, तब प्रह्लाद तथा लक्ष्मी-सहित शिव-प्रार्थना से वे शांत हुए। नरसिंह की उपासना में 'नृसिंह स्तोत्र' प्रसिद्ध है।
नरसिंह अवतार की कथा श्रीमद्भागवत पुराण (सप्तम स्कंध) तथा विष्णु पुराण में विस्तृत है।
नाते-रिश्ते
- अवतार: विष्णु (चतुर्थ)
- भक्त: प्रह्लाद
- शत्रु: हिरण्यकशिपु
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 7); विष्णु पुराण