कूर्म अवतार
वेद एवं पुराण
अन्य नाम: कूर्म, कच्छप अवतार, द्वितीय अवतार, मंदर-आधार
कूर्म अवतार विष्णु के दशावतारों में द्वितीय है — कछुए का रूप। इसका प्रयोजन समुद्र मंथन में सहायता करना था। जब देवता और दानव क्षीरसागर का मंथन कर रहे थे, तब मंदराचल पर्वत को आधार चाहिए था; भगवान ने कूर्म (कच्छप) रूप धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया, जिससे मंथन संभव हुआ।
कथा के अनुसार मंथन की भारी गति से मंदराचल धँसने लगा और देव-दानव घबरा गए। तब भगवान कूर्म रूप में प्रकट हुए और उस विशाल पर्वत को अपनी पीठ पर स्थिर रखा। मंथन के दौरान वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया — देवताओं ने मुख और दानवों ने पूँछ पकड़ी। इसी मंथन से हलाहल विष, लक्ष्मी, कामधेनु, ऐरावत, कौस्तुभ मणि, चंद्र, धन्वंतरि अमृत आदि रत्न प्रकट हुए।
कूर्म अवतार की कथा श्रीमद्भागवत पुराण (अष्टम स्कंध) तथा विष्णु पुराण में समुद्र-मंथन के प्रसंग में वर्णित है। कूर्म को परंपरा में धारण-शक्ति और स्थिरता का प्रतीक माना गया है।
नाते-रिश्ते
- अवतार: विष्णु (द्वितीय)
- सम्बन्ध: समुद्र मंथन
प्रसिद्ध कथन
संबंधित
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 8); विष्णु पुराण